सनातनी परम्परायें
सनातन स्वयं में एक विज्ञान है। कल तक जिस कपूर के धुएँ को पर्यावरणविदों ने प्रदूषण कहकर खारिज कर दिया था आज वही धुआँ संकट में प्राणवायु बन गया है. एक समय था जब प्रत्येक घरों में सुबह-शाम कपूर की की धुनी की जाती थी.
सम्पूर्ण घर के कोने-कोने में कपूर का धुआँ किया जाता था.
ततपश्चात घर के सभी सदस्यों को कपूर की धुनी दी जाती थी.जिसमें जलती लौ का धुआँ दोनों हाथों से लेकर चेहरे से लेकर सीने तक हथेलियाँ फेरी जाती थी.
किन्तु अधुनिकता की अँधी दौड़ और चंद किताबें पढ़कर पाई डिग्रियों के आकंठ घमंड में हम इतने चूर हो गये कि इन्हें अंधविश्वास मान लिया.
हवा में कपूर का प्रयोग ढोंग और समय बर्बादी लगने लगा.
प्राणवायु कपूर की धुनी धुआँ लगने लगा।
खुद को वैज्ञानिक समझने वाले हमनें ये जानने की कोशिश ही नही की, आखिर हवन,कपूर रीति रिवाज हमारी जीवनशैली का हिस्सा क्यों थे?
हमारे पूर्वज विज्ञान से भलीभाँति परिचित थे.
सनातन स्वयं एक विज्ञान है.
लेकिन उसवक्त कोई वैज्ञानिक शब्दावली तो थी नही
अतः उन्होंने विज्ञान को धर्म से जोड़कर दिनचर्या का अहम हिस्सा बना दिया.
आज वैज्ञानिक प्रयोग कर मान रहे है कि जहाँ नित्य हवन होता है,वहाँ सूक्ष्म परजीवी का खतरा सबसे कम है.
मात्र तीन-चार दशक पूर्व तक प्रत्येक घरों में हवन होते थे.
किन्तु आधुनिकता को सर्वश्रेष्ठ और सनातन को पिछड़ा मानने की मानसिकता के चलते हमने सबकुछ भुला दिया.
इसका दोष भी हमनें अपने बड़े-बुजुर्गों पर मढ़ दिया.
किन्तु आपके बड़े बुजुर्ग तो पढ़े लिखे नही थे परन्तु आप तो थे?
आपने क्यों नही रीति रिवाजों के पीछे छुपे विज्ञान को जानने की कोशिश की?
खुद को पढ़ा लिखा कहने वाले हम ये भूल गए कि
विज्ञान बिना प्रमाण के किसी को विश्वास/अंधविश्वास नही मानता.
फिर आपने कैसे बिना प्रमाण के मात्र दुष्प्रचार में बहककर
सर्वश्रेष्ठ सनातन परम्पराओं को अंधविश्वास ठहरा दिया?
आज दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी के वक्त,
मानवता पर संकट के वक्त आधुनिक दुनिया पुनः सनातन की शरण में है.
"हवन,कपूर,अजवाइन,हल्दी,हस्त प्रच्छालन,
नमस्ते लड़ाई जीतने के मुख्य अस्त्र बन गए है."
मजबूत जड़ो वाला वृक्ष ही आंधी-तूफान, झंझावतों में टिक पाता है. अतः अपनी जड़ों (सनातन) से जुड़े रहिए.. हम सब ये लड़ाई अवश्य जीतेंगे..
Nice 😍
ReplyDelete